बहुत पहले की बात है। गाँवों में फसल कटने के बाद लोग खुशियाँ मनाते थे। माना जाता है कि इसी समय राजा शिवि (या राजा शिबि) अपनी प्रजा की भलाई के लिए मशहूर थे। वे चाहते थे कि किसी के घर में भूखा न रहे।
राजा ने परंपरा शुरू करवाई कि माघ महीने में बच्चे और युवक “छेर-छेरा” कहते हुए घर-घर जाएँ। हर घर से लोग धान, चावल, दाल या कुछ खाने का सामान दान में दें। यह दान साझेदारी और समानता का प्रतीक था—जिसके पास ज्यादा है, वह कम वालों के साथ बाँटे।
धीरे-धीरे यह परंपरा त्योहार बन गई। लोग गीत गाते हैं—
“छेर-छेरा, छेर-छेरा, माई कोठी के धान ला छेर-छेरा”
और खुशी-खुशी दान देते हैं। माना जाता है कि ऐसा करने से घर में बरकत आती है।



